क्षत्रिय कौन है?
बड़ी मूँछें, अहंकारी, बहुत सारी ज़मीन, और लड़की को घर से उठा ले जाने वाला?
या फिर दयालु, सामाजिक हित को अपने हित से ऊपर रखने वाला, शत्रु को भी सम्मान देने वाला, न्याय करने वाला, धर्म (कर्तव्य, न कि मज़हब) के लिए मरने वाला, वचनबद्ध, और साहसी।
पहले वाला फिल्मों में बताया गया। और दूसरा, जो बताया गया, वो क्षत्रिय (ठाकुर) असल मायने में है। वो लोग जो ऐसे हुए, इतिहास ने उन्हें याद रखा। परंतु आज के ठाकुर समाज के सुधारक नहीं हैं, समाज की कुरीतियों को बढ़ावा देने वाले, दबाव में दब जाने वाले, कपटी, स्वार्थी और आत्ममुग्ध हैं।
आज के ठाकुर ने कभी तलवार नहीं उठाई। आज का ठाकुर 20 दण्ड मार दे तो अगले दिन पैरासिटामोल लेनी पड़ेगी और फिर पुरानी दबी बवासीर भी उभर सकती है। आज का ठाकुर बॉस की गाली सुनता है, क्लाइंट का पैसा चोरी करता है, डाँट सुनता है, और शाम को ठाकुरानी को पीटकर अधमरा कर देता है। आज का ठाकुर पुराने ठाकुरों की बात करता है। वो अपने रक्त को शुद्ध बताता है और दूसरों के रक्त को अपवित्र। जबकि राशन कार्ड, बीमा योजना, लक्ष्मी योजना, सरकार की सारी योजनाएँ, जो ज़रूरतमंदों के लिए हैं, उन्हें कपट भाव से, समर्थ होते हुए भी लेता है, और उस "अपवित्र" व्यक्ति के हक़ का सरकारी चावल खाता है। पहले के ठाकुर अपनी कीर्ति से क्षेत्र में ही नहीं, विश्व में जाने गए। आज तक उनके नाम की फ़िल्में बनती हैं। इस बँटे हुए समाज में आज भी श्रद्धा भाव से अपने पुराने क्षत्रिय राजाओं को याद किया जाता है। और आज का ठाकुर अपनी ईएमआई पर ली हुई बुलेट पर अगर "क्षत्रिय" न लिखवाए, तो दूसरी जाति से अंतर करना मुश्किल हो सकता है।
पहले के ठाकुर विश्वविद्यालयों के लिए अनुदान देते थे, ज़मीन देते थे, और अन्य देशों के राजा-महाराजाओं से ज्ञान में कम नहीं थे। वे समस्त विद्याएँ जानते थे। आज का ठाकुर जब शहर के कॉलेज में फेल होता है, तो गाँव के कॉलेज के दूसरी जाति के प्रिंसिपल से पैरवी कर पास हो जाता है।
आज का ठाकुर जान चुका है कि औकात से बाहर बोलने से इज़्ज़त होती है। इसलिए वह अपने धर्म को धारण करने वाले भीष्म और अर्जुन, तथा जनता के लिए समर्पित अपने राजाओं की कीर्ति को नहीं पढ़ता। वह पढ़ता है मार्क्स को, लेनिन को, और समाजवाद पर चर्चा करने निकल पड़ता है। कभी किसी ठेले वाले को बता दिया, कभी किसी और को। उपहास करता है कि वो भाजपा या कांग्रेसी क्यों है, मार्क्सवादी या लेनिनवादी क्यों नहीं बन जाता, उसकी तरह? इसमें न कांग्रेसी कुछ बोलेंगे, न भाजपा वाले जान पाएँगे कि आप हिन्दू पक्ष के समर्थक हो या मुस्लिम पक्ष के, और आपको पूरी तरह गालियाँ भी नहीं पड़तीं। देश संकट में हो तब क्षत्रिय राजा ने प्रजा के समान ही घास की रोटी खाई। आज का क्षत्रिय देश को चूल्हे-भाड़ में भेजकर होर्मुज़ पर समाचार देखता है और रसोई से आवाज़ आने का इंतज़ार करता है कि "मटन तैयार है, आइए खा लीजिए", ...ताकि वह 'चुस्ता वाला पीस' खा सके, जो वह सिर्फ अपने लिए लाया था।"
आज का ठाकुर औरतों पर अपने हक़ को नहीं भूला। उसने इतिहास तो पढ़ा नहीं, गानों और फिल्मों से लेकिन यह जान लिया कि ठाकुर बलात्कारी या बुरी मंशा का व्यक्ति होता है। तो उत्तेजित होकर आज का ठाकुर दूसरी जाति की लड़कियों को छूने से तनिक भी नहीं कतराता। हाँ, लेकिन माँ-बाप अगर शादी करवा दें, तो फिर उन्हीं लड़कियों और उनकी जातियों का तिरस्कार करता है। पहले के ठाकुर युद्ध लड़ते थे और राज्य विस्तार करते थे। आज का ठाकुर भाई की ज़मीनें कब्ज़े करने में है, उन्हीं से युद्ध करता है।
आज का ठाकुर गायत्री मंत्र बोल सकता है, पर लिख नहीं सकता। सर्वविद्याओं के ज्ञान की बात मत करिए।
आज का ठाकुर मत बनिए। बनिए वो, जिन्हें अपने गौरव के लिए अपना टाइटल न चमकाना पड़े।
वचनबद्ध बनिए।
न्यायपूर्ण बनिए।
विनम्र बनिए।
जो पेड़ जितना फल देता है, उतना ही झुका होता है।
और उन जातियों में भी, जिनमें ये भूले-बिसरे गुण दिखाई दें, जानिएगा कि असल मायने में वही क्षत्रिय है।
क्योंकि गीता में भी उपदेश है कि- "वर्ण जन्म से नहीं, कर्म से होते हैं।"





