Tuesday, October 11, 2022

छोटे घर की बेटी

हां भाई सही पकड़े हैं  " छोटे घर की बेटी... "

भई हम तो न है बडे़  और न बड़ा बन्नो के शौक़ ही हैं, हां माल मोटा मिले और बड़ा घर मिल जाए और छोटा हो दुल्हा के दूल्हे के विचार हमे क्या?

सही पकड़े हैं, बियाह करने जा रही हूं मैं। मै यानी चंपा चमेली..... बचपन का सपना बस पूरा ही होने वाला है। पहले फैशन में सजती थी अब पिया जी के लिए टिकुली और नखुनपालिश और फाउंडेशन पोतूंगी। आप अचंभित होंगे मैंने खुदको प्रेमचंद  वाली उस आनंदी से परे छोटे  घर की बेटी क्यू कहा? भाई बात बड़ी  सीधी सी है,। हम आनंदी की तरह बड़े विचारो वाली नही जो देवर की जली कटी सुने, फिर भी घर जोड़े रखे।।। हम छोटे घर की सही। 

हां इससे क्या फर्क पड़ता है, के लड़के वाले खून चूस ले जाए, मेरे परिवार को नजरंदाज करे... मैं भी तो शादी के बाद उनका खून.... अ अ... अहम... ह....

नही मतलब मेरी कोन सी रोज शादी होनी है। मैं तो इतनी excited हु के अभी से सब सामान खरीद लाई हु... "उनसे" भी फोन पे रोज बात हो जाती है, दिक्कत होती थी। तोह साफ़ कह दिया कान खोसना दिला दीजिए, बहुत दीवाने है, अगले दिन भिजवा दिए...

हां no compromise कोई मरे या जिए हमको शादी परियों वाली चाहिए हम तो न बताएंगे सच्चा हाल और न खुद पैसे कमाते हैं के जाने पैसे कहा से आते है।

मै तो बस प्रेम की दीवानी हु और प्रेम की हो जाना चाहती हूं। मै और मेरे प्रेम खूब
buffet का खाना खाए और गाड़ी से निकले फिर उन का टेंशन बनूंगी I mean जीवन साथी।

मै छोटे घर की बेटी जल्द ही "छोटी बेटी commission" का प्रस्ताव सदन में लाऊंगी और सरकार से मांग करूंगी के मुझसी, और अबला सारी छोटी बेटियां शादी बेफिक्री से करे और हमारा नारा होगा - "शादी बार बार थोड़ी होती है।"

मुंह काला हो प्रेमचंद का।

प्रणाम।

- खुदकी चंपा चमेली

Friday, April 10, 2020

खुशमिजाज लड़कियां


आपने 'जब वी मेट ' फिल्म जरूर देखी होगी, उसमे करीना कपूर का पात्र बहुत चुलबुला दिखाया गया है। बहुत छटपट, हर पल को जिंदगी से भर देने की चाहत उसके दिन को चलाती थी। ऐसे ही कई और हिंदी फिल्में और हैं, जिनमें ऐसे ही रूप में लड़कियों को दिखाया गया है। पहले मैं इन्हें पागल समझता था। इनके चुलबुले पन को पद्रे का एक नाटकीय चित्रण मानता था। पर जैसे जैसे बड़ा हुआ असल जिंदगी में भी लड़कियां ऐसी ही दिखाई दी। अपनी सबसे अच्छी सहेली हो या सबसे बड़ी दुश्मन, ये इस उत्सुकता से गले लगा लेती हैं जैसे छोटा बच्चा कई दिनों के जिद्द के बाद मिले खिलौने पाकर उत्सुक होता है।
इतनी गर्मजोशी आती कहा से है इनमें?!!

धीरे- धीरे उम्र के साथ दिमाग विकसित हुआ, घर से बाहर निकला तो कई भ्रांतियां भी टूटी। हर गैर नारीवादी पुरुष की तरह मुझे भी अपनी भ्रांतियां टूटने का अक्सर दुख़ हुआ करता था। फिर अपने मन को दुःख से बचा लेने के लिए मैंने एक टोटका अपना लिया - " आदमी को जो चीज़े समझ नहीं आती, वह उनके पक्ष में भ्रांतियां बना लेता है" ।
टोटका सटीक था मुझे भी अपने नीचपन पर अब कोई दुःख ना रहा और स्त्रियों का यह नयापन मै पचा सकने लगा।
ख़ैर बात लड़कियों की थी। हां!!, तो इनके (लड़कियों के) और गुण भी थे जैसे- किसी भी जगह, कैसे भी माहौल में इनका नाचने का जी कर जाना। ऐसी मै दो तीन लड़कियों को जानता हूं जो किसी भी वक़्त नाचने को उत्सुक रहती हैं। अब मेरी बहन को ही ले लीजिए- कल मुझे नाच सिखाना चाहती थी।
पर इसके विपरित कुछ और तरह की लड़कियां भी होती हैं जो ' गुमसुम' रहती है। ख़ैर, उनका अध्ययन करने का मुझे कभी मन नहीं हुआ। तो मेरे हिसाब से लड़कियों की दो ही प्रजातियां हुई - एक वह जो बहुत ' उत्सुक' स्वभाव की होती हैं, सीधे शब्दों में "खुशमिजाज लड़कियां" और दूसरी "गुमसुम" सी।
ख़ैर, दूसरे पहलू की बात करें तो जैसे ' जब वी मेट' पिक्चर में करीना के साथ हुआ था, उसका पहला प्रेमी उसे छोड़ देता है और वह टूट जाती है। सारी खुशमिजाजी छोड़ देती है। वैसे ही मैंने कहानियों और असल जिंदगी में होते देखा है।
कहानियों के हिसाब से आप ' निर्मला ' (मुंशी प्रेमचन्द जी) को अगर पढ़ें तो, उस लड़की निर्मला में आप ठीक वही सारे गुण पाएंगे जो मैंने "खुशमिजाज लड़कियों " में गिनाए थे। इस कहानी में एक सिन्हा साहब के लड़के होते हैं, जो तय की हुई शादी को दहेज ना मिल पाने के कारण त्याग देते हैं। दहेज इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि निर्मला के पिता का देहांत हो गया था। इन सब घटनाओं के बाद निर्मला एक अपने से कहीं बड़े व्यक्ति, ' मुंशीजी' के साथ शादी कर लेती है। शादी के चंद वर्षों में ही असंतुष्ट गृहस्थ जीवन के कारण उसके हसीं- ठिठोली सब बंद हो गए और उसका खुशमिजाजपन जाता रहा। अंत में निर्मला का देहांत हो जाता है, वह अपने इस बदले रूप को और रंगहीन जीवन से हार मान लेती है और शरीर त्याग देती है।
निज जीवन में मै भी एक खुशमिजाज लड़की को जानता था।
उसके मा- बाप कम पढ़े लिखे थे और बाप अक्सर मा को जानवरो की तरह पीट दिया करता था। सिर से खून तक आ जाया करता था। दबे शब्दों में कहूं तो, उस लड़की और मेरे बीच बहुत अच्छे संबंध हो गए थे। आगे जब मुझे उसके परिवार का पता चला तो मैंने सारे नाते तोड़ उसे अलविदा कह दिया। डरपोक था।
वह लड़की बहुत ही सीधी- साधी थी। ठीक उस पिक्चर की नायिका की तरह अन्दर से बेहद चंट और उत्सुकता से भरी। मा के चले जाते ही फोन करना और देर तक छुप के बातें करना, उसके कई लक्षण थे जो मुझे बहुत चकित करते थे। ऐसे तो कभी घर से बाहर न जाती पर अक्सर मुझे तोहफे लाया करती और चूपके से बुलाकर दे दिया करती। मैं उसकी इन प्रतिभाओं का कायल था।
वह शायद और प्रतिभाओं की धनी रही होगी। पर उसकी यह ' खुशमिजाजी' की प्रतिभा मुझे आजतक प्रभावित करती है। हा, मेरे जाने के दो- तीन सालों बाद फिर उसे देखा है। दुबली सी है, मंदिर जाती है ज्यादा पूजा करती है, शायद। मा- बाप को शायद पता चला हो सो किसी वक़्त अकेला नहीं छोड़ते। सोचता हूं, क्या यह वही लड़की है, जो मेरे मुंह में मिठाईयां ठूस दिया करती थी, और जिसे खाने के बाद मै बेशर्मी से पानी मांग लेता, और फिर भी वह मुस्कुरा कर पानी पिला दिया करती थी!?
क्या मैंने उसकी खुशमिजाजी छीन ली?!
मै अब सड़कों पे ज्यादा निकलता हूं, पहले पुरुष मित्रों की संख्या ज्यादा थी पर अब लड़कियां ज्यादा हैं। अब अक्सर ऐसी लड़कियों से मिलता हूं जो सिगरेट पिती हैं, और गालियां बकती हैं। मैं मुस्कुराता हूं। मै अब नारीवादी होने का ढोंग नहीं करता। और जब कोई ऐसी लड़कियों की बुराई करता है तब मैं कहता हूं-। " मनुष्य को जो बातें समझ नहीं आती, वह उनके पक्ष में भ्रांतियां बना लेता है"।




Monday, November 25, 2019

Apologies to Ambedkar


"If I find the constitution being misused, I shall be the first to burn it.”
- Ambedkar

No idea if today is the day we should really wish each other 'Happy constitution day' or apologise to Ambedkar for the abuse done to his constitution. 
"We The People" have come back to square one. Religious and communal divide is more than visible in today's 'political' India. I remember in school how we used to think that early Indians were stupid for getting divided so easily by foreign powers. The same thing is happening right now except the 'rulers' are domestic this time.
Private institutions of the capitalist are categorised as 'institutions of imminence' and reinforced with public money. 
On the other hand, public institutions ( universities , schools)are underfunded and the lathicharge is done upon the students who demand for cheaper education. (from the poor sections). Ministers who are elected under the impression to 'serve the people' are serving themselves. We can see that in Maharashtra. Super 30 had tried to change the concept of 'Raja Ka Beta Raja Nahi Banega' but sadly Uddhav Thackrey watches only Marathi. Fadanvis is more keen to be the 'sevak' than before. So much that he had to take an oath early in the morning. With that another sevak comes up in my mind. But that's for later 😅.
Maybe, I am a pessimistic person. But, I have found out a cure for that too. I am listening to 'Mann ki Baat' more often and every day getting 'DNA' Analysis of my brain done  by professionals. Also, joint-rolling is something I'm trying to learn, because at times when govt. entities like - Bharat Petroleum, Indian Railways are being sold out. It is only joint that can pump some positivity into me. Also, according to a study by 'Durniti Aayog' the visible signs of unemployment are diminished by smoking joints.
Last but not least 'JIO..........or jine do'.

Thursday, November 7, 2019

The unforgettable Curse

I am a very nostalgic person and find comfort in the past.
In 2015, sitting in the back benches of my tuition class(studying math & stuff) I and the guys were disturbing the class. We were always very ignorant of whatever was taught in the class and used to make fun of the teachers. Little did I know that one of my teachers will tell me the biggest set of traumatic words that will change the course of my life. Annoyed by our constant hooting and 'chakkallas' our physics teacher turned towards us with a grim and heavy face. We knew we had done enough to get a 'lecture' of sorts 'again'. But this time it was different, he opened his lips and said the worst possible thing I ever heard. He said-

'Bahut mja aarha hai tu log ko, abhi dost log acche lag rhe hai, karle jyda din nahi hai 12th k bad dekhna kon kha jyga, ek dusre ko yad bhi nahi rakhoge'

I knew then something was strange about this. But soon after 12th ended we were struck with this reality. Most of my friends got separated, many left studies due to family pressure and started doing menial jobs, many switched to different disciplines. The girl I loved then, moved on to a wonderful college only to disappoint me with 'Who Raman?'
Despite all this, I never thought my childhood friend would be separated from me. We were studying together for past 5 or so years. Regardless of all pressure from our parents we never left each other's side. The memories of our first cigarette  to our first girlfriends we had seen everything together. But 12th changed it all, it's been years we hardly meet.
Everyday while going to bed the words of that physics teacher rings in my ears. It was not a warning, it was a curse.

School का duster

वो school का duster याद है? अरे ! वहीं लकड़ी का टुकड़ा, जिसमें सफ़ेद पट्टी लगी होती थी, जो ब्लैक बोर्ड को मिटाने के काम आती थी और कभी कभी teacher जिसको फेंक कर मारा करते थे। याद आया?
आज एक स्कूल के बाहर से गुज़र रहा था तभी एक बच्ची को ज़ोर ज़ोर से दीवार पर डस्टर पीटते देखा। डस्टर को पीटते हुए, लड़की ने अपनी नाक सिकोड़ रखी थी, धूल से बचना चाहती थी शायद। पर धूल का वो गुबार हमेशा की तरह हाथों और चेहरे सबपर जाकर बैठ गया। बहुत खूबसरत था वो नजारा, मानो एक पल के लिए मै स्कूल लौट गया।
डस्टर के साथ कुछ कड़वी यादें भी है, स्कूल के maths teacher Shri Gopal krishna sir एक बार डस्टर से मुझे धोए थे। क्लास को परेशान कर रहा था। खन्ना जी, चांडक, और मै जम कर धोए गए थे। अक्सर पिछली बेंच के बच्चे ही डस्टर से लतियाए जाते थे, खन्ना जी भी डेली ही लात खाते थे, लेकिन उस दिन मेरी बारी थी, सर जी उछल उछल कर मार रहे थे, और मै pokemon की तरह dodge कर रहा था। कमाल का नजारा था। मार खाते हुए खुद मेरी हसी छूट रही थी।
उस दिन को याद करता हूं, तो फिर से स्कूल पहुंच जाता हूं, जैसे की आज।





Wednesday, May 15, 2019

Roll -Camera, aaannd.... VIOLENCE!!!

आज बाल कटाने सैलून गया था... 
वहाँ पडे TV  में news channel लगा हुआ था।  समाचार में बता रहे थे कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर  को बंगाल में पटक दिया गया है।  दोष BJP  और TMC के युवा कायकर्ता एक दूसरे पर लगा रहे थे।  खैर,  पटका किसी ने हो, मुझे खास दुख नही,  ब्लकि दया भावना है। उन युवाओं के लिए जिन्होंने उन्हें गिराया। शायद ही वे कभी इस अपराध की गंभीरता को समझ पाएंगे। वैसे भी अब आदर्शों को कौन याद रखता है साहब?
आजकल तो नेता भी नचनिया,  और जनता भी।  मूल्यों की भी जगह filmy scripts ने ले ली है।

बंगाल हो या उत्तर प्रदेश,सबने समझ लिया है कि अब तो मूल्यों की राजनीति समाप्त है।  इसिलिए शायद Urmila Matondkar मैदान में उतरीं।  सूनने में आया कि जब वह मेकअप कर उठीं तो अचानक, उन्हे समाज में इतना अन्याय दिखा की वे झट से जाकर Congress से जुड़ गईं।  उधर,  दीदी ने भी उन्नति ( উন্নয়ন)  के मुर्झाते पौधे में पानी डालने के लिए मिमी चक्रवर्ती,  नूसरत जहाँ,  सूपरस्टार देब,  मूनमून सेन का सहारा लिया,  साथ ही सत्ता में वंशवादी ताकतों के खिलाफ अपने भतीजे अभिषेक को भी गोद में बिठा लिया है।
BJP भी पिछे क्यों रहे? आजमगढ़ से निरहूआ  को उतार दिया, और सनी देओल को ढाई किलो के हाथ के साथ गुरदासपुर रवाना किया।  बाकी पार्टियों ने भी कोई तिकड़ी लगाई होगी,  मेरा विश्वास है। साथ ही यह भी यकीन है कि लोकतंत्र को बचाने उतरे हमारे  Cinema Stars बहुत मार्मिक होगें,  और जनता की परवाह करते हैं। हाँ, गलती हमारी होगी अगर ये लोग न जीत पाए। इसलिए जरुरी है कि, देश के लोग खूले  हाथों से इन लोगों के मेकअप के सामान के लिए योगदान करें।

अब नया युग है। यह ध्यान रखिये।

इसके साथ ही देश की सभी लोकतांत्रिक पार्टियों से अनुरोध है कि, कृप्या थोड़ा और मार्मिक बने, और आपकी जीत के लिए जो वस्तुऐं लगे उनका ही उपयोग करें, बाकी गंगा में फेंक आए।  कहिए तो उन सभी युवाओं की तरह मैं भी- 'गाँधी', 'सुभाष चंद्र',  'विद्यासागर', 'भगत सिंह' सभी के विचारों और सिखाए नाकाफी मूल्यों की गठरी बाधने में  मदद करूँगा।
-रमन

Tuesday, March 26, 2019

भारतीय जनता का default mode

क्या है, भारतीय जनता का मिज़ाज? कुछ दिनों में इलेक्शंस शुरू होंगे फिर exit polls ... सब कुछ साफ़ दिख जाएगा, के कौन जीता कौन हारा. Election का अब cricket से कोई दूर का अंतर नहीं बचा, जनता के लिए 'क्या लगता है, कौन जीतेगा?' मायने रखता है, भले से जितने वाली टीम से देश को क्या तरक्की मिलेगी, ये सवाल लोगो की उन्मादी सीटियों में सेहम कर बैठ जाए.
Default mode का अर्थ है, जैसा पहले था वैसा रहे. मोबाईल में कुछ ना समझने पर इसका use सभी प्राय कर ही लेते हैं. बहुत समय पहले अंग्रेज जो भारत में divide manufacture करके चले गए, हम उसी divide को डिफॉल्ट के मोड पर डाल कर चल रहें हैं।
Hindu- Muslim की लड़ाई ने क्रांतिकारी विचारधाराओं को बोरिया बिस्तर बांधने पर मजबूर कर दिया है. सभी intellectuals अपने अपने हिसाब से अपने धर्म को, या उनके धर्मो की कट्टरता को सपोर्ट करने वाली विचारधाराओं को protection देने में लगे हैं. हिन्दू खाना पीना छोर कर बस 'मंदिर वहीं बनेगा' की रट थामे बैठे हैं। मुसलमान चाय वाले को अपना दुश्मन बनाए बैठा है.
सारी पार्टियां अपने झंडे में हरे और भगवा रंगो को और गाढ़ा करने में जुटी हैं. इन सब से तो यही साबित होता है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम समाज की setting से अंग्रेज़ो द्वारा बनाई default mode को नहीं हटा पाए.

मेरे मुस्लिम दोस्तो ने दुआएं पढ़ ली और वोटर कार्ड को रोज पोछ रहे है, कहते हैं - वोट दीदी को या दादा owaisi को देंगे, कुछ तो rahul gandhi को साल भर गालियां देने के बाद भी congress को समर्थन देने के लिए तत्पर हैं, दूसरी ओर हिन्दू मित्र mahadev ओर hanuman जी को रोज आरती दिखा रहे, सर पे तिलक लगाए घूमते हैं मानो 'nationalist' का चिन्ह हो.
लगता है, यह default बदलने के लिए कोई और युवा पीढ़ी का इंतज़ार करना होगा. अगर आप ये default बदलना चाहते हैं तो, झंडा उठाकर देखे ' भगवा (saffron) और हरा (green)' दोनों झंडे का हिस्सा हैं. और जो भी पार्टी सिर्फ एक रंग की बात करे उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाएं। यह देश हिन्दुओं और मुसलमानों का है, सिखों और ईसाईयों का हैं, और उन बच्चों का हैं, जो आज भी झंडे को पूरा देखते हैं.
Jai Hind.



Sunday, January 20, 2019

भारतीय लोकसभा का सूखा सूखा चुनाव



अक्सर Tv पर pepsi का एक advertisement बहुत पसंद आता है, ख़ासकर उसमें बोले जाने वाली line की वजह से ' क्या भाई सूखे-सूखे?'

आज वो लाइन लोकसभा चुनावो के महत्व से उपयोगी हो चुकी है। आज महागठबंधन की maha-meeting कोलकाता में हुई, कई बड़े नेता आए थे, कई मुद्दे की राजनीति के लिए भी आए होंगे ऐसा मेरा विश्वास है। शहर में छोटा- मोटा पर्व सा माहौल बन चुका था। लाखों की भटकी और शायद न्याय की अपेक्षा रखने वाली भीड़ भी मौजूद थी। उसी भीड़ का एक बड़ा हिस्सा state-sponsored डिम- भात भी खाने आयी थी। अगर आप विदेशी सोच वाले हैं तो आपको बताना चाहूंगा के ये प्रथा भारत में काफी दिनों से है। UP- BIHAR में चुनाव चाहे राज्यसभा चुनाव हो या ग्राम पंचायत या प्रधानी का नेता, अपने वोटरों के घरों में मुर्गी और बकरी पहले से भेज देते हैं। इस आशा में के आम दिनों में हुई नेता की बैमैनी को वो मुर्गा खाकर भूल जाएंगे और अपना वोट उन्हीं को देंगे। हालांकि, हमारे अंचल के कुछ वोटर अपने लोकतांत्रिक (democratic) अधिकार का मूल्य जानते हैं, और बिना सस्ती दारू के किसी को वोट देना धोका समझते हैं।
ये चलन लोकसभा चुनाव में भी आ चुका है, दीदी के मीटिंग में गए सभी लोग गाड़ी भर- भर के अंडा- चावल खाने गए, गलियों में दीवारों पर भी मेनू छपा मिला। लोग खुश थे, पर यहां भी चालाकी से काम लिया गया, अंडे half-piece ही मिल रहे थे। लोगो में नाराज़गी आगई।
मेरा ये संदेश मोदी जी के लिए है - जब आप मीटिंग करे तो पूरा अंडा दें। और याद रखे कुछ लोग advertisement में दिखने वाले उस कलाकार की तरह भी होंगे, उनको शिकायत का मौका ना दें, के वे भी बोल उठे - ' क्या मोदीजी सूखे- सूखे?'

तैयार रहे, लोसभा में जितने का मूल्य एक पूरा अंडा और चावल है।

Wednesday, November 7, 2018

20 रुपिया प्लेट

कलकत्ता के कालीघाट इलाके से कुछ दूर पर ही मैंने हास्टल लिया था। आज मुझे अपने घर से हास्टल के लिए निकलना था। हालांकि, बाकियों की तरह ना ही मुझे घर से दूर रहने का कोई डर था ना ही रैगिंग करने वाले स्टूडेंट्स की कोई परवाह।
पर आज सुबह से ही घर में एक अलग तरह का वातावरण साफ जान पड़ रहा था , मेरे घर ना रहने का डर मेरे माता-पिता के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा था। लेकिन, मैं खुश था आखिरकार जीवन में कुछ बदलाव आने वाले थे।
परन्तु, एक प्रश्न, व्यंग बनाकर बार- बार मेरे सामने प्रकट कर दिया जाता था-
' कहो उहा तोहार कोटा पूरा करे वाला के मिली?' अथार्थ वहां तुम्हें मन मुताबिक और भर पेट खाना कौन खिलाएगा?।
सदियों का अनुभव लिए युवा से प्रोढ़ हो चुके हर व्यक्ति की जुबानी सुन चुका था- ' वहां कोई क्यूं बढ़िया बनाएगा? जो मिलेगा वही खाना पड़ेगा।'
पर मैं इन बातों को मन-गढ़त समझता था। क्यूं न समझूं?! भला हमारे चचेरे भाई जो की बनारस में पढ़ते थे उनके साथ तो ऐसा कुछ नहीं था। उल्टे गोलू भैया की तोंद में कोई कमी नहीं आयी थी। और मैंने तो उनके हॉस्टल का खाना भी चख रखा था, जो की मुझे उत्तम लगता था। खैर, जो-त्यों मैं हॉस्टल पहुंचा। रास्ते भर सोचता रहा की क्या मुझे मम्मी- पापा के पैर छूने चाहिए थे? पर यह सोच कर की वो रो देते, मैं खुद के पैर न छूने के फैसले को सही ठहराने में लगा रहा।
मुझे मेरा कमरा दिखाया गया, मेरे रूम पार्टनर उसी माह की 7 तारीख़ तक आने वाले थे इसलिए कमरा पूर्णतः खाली था। आराम करने की सोची तो आंख फिर संध्या सुबह 6:30 में ही खुल पाई।

पेट से चूर्र की आवाज़ आई तो मन खाने की इच्छा करने लगा। परन्तु मुझे याद आया की वैसे ही पहले से दोपहर और रात्री के भोजन के दाम 70 रुपए हैं मैं व्यर्थ ही संध्या की छोटी-मोटी भूख मिटाने में पैसे नष्ट करूंगा। मन बहलाने के लिए एक पुस्तक पढ़ने लगे पर न जाने कुछ पुस्तक की कहानी से कुछ पेट की भूख से मैं ज्यादा देर पढ़ नहीं सका। करवट लेते ही मेरे मन में ख्याल आया के रोज इसी वक़्त- कभी chowmein, कभी pasta माता जी से किसी तरह जबरदस्ती बनवा लिया करता था। ठंडी आहें भरी और फिर ध्यान पुस्तक की ओर केंद्रित किया। कुछ 1-2 घण्टे बाद बगल के कमरे के एक लड़के से बात हुई। सारे संसार की बातें करने के बाद मुझसे रहा न गया और मैं पूछ ही बैठा-

' এই মাসী টা কি জিজ্ঞেস করতে আসবে রান্নার জন্য?'

अथार्थ क्या यहां की मासी मुझसे खाने के लिए पूछने आएंगी?

तब उसने बताया कि वह और उसके साथी कहीं बाहर खाया करते थे। पर उसने मुझे आस्वस्त किया के वो मुझसे पूछने कभी भी आती होंगी। दरअसल, उस हॉस्टल में कहने पर ही खाना बनाया जाता था। यह आश्वासन पाकर मैं कमरे की ओर चला। पहुंचा तो पापा का फोन आया। पूरे समय यही पूछते रहे की मुझे कोई दिक्कत तो नहीं आ रही है?
और मै पूरी दृढ़ता से जवाब देता-
' अरे ना! ना! कोनो दिक्कत ना हऽ।'

फिर उन्होंने खाने का प्रश्न उठाया और पूछा के खाना खा लिए? इसपर मैंने ' नहीं ' में उत्तर दिया और हॉस्टल में खाने को पूछे जाने का रिवाज़ बताया। तब उन्होंने कहा, साढ़े नौ बज गए हैं, जाकर पूछ लो शायद भूल जाएं। अब तो मेरी भी हिम्मत टूट गई। फोन रख कर मै बाई की तलाश में निकला, कुछ लड़कों के कमरे से गुजरते हुए थाली और रोटी जैसी आकृति दिख रही थी। मैंने अपने कदम अब और तेज़ किए और उन्हें ढूंढने लगा। भेंट होने पर जब मैंने खाने का प्रश्न उठाया तब उसने कहा कि वो मेरे कहने की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था की वो मेरे बारे में भूल गई थी। अब मेरे पास बाहर जाकर खाने के अलावा कोई और चारा नहीं था।

दूसरे लड़के पहले ही जा चुके थे। अब मुझे अकेले ही जाना था। हॉस्टल के दरवान से जब मैंने अपनी दुख गाथा सुनाई तो उसे मुझ पर कुछ दया आई और उसने अपना हाथ उठाकर हवा में लहराते हुए दाएं बाएं का इशारा करते हुए कहा कि वहां पर जाकर खा सकते हैं।
उसके इशारे का अंश भर ही समझ पाया और जल्दी खाने की तलाश में निकला। चौराहे तक पहुंच के नजर दौड़ाई चारों ओर एग रोल, चिकन रोल,चाऊमीन बिरयानी, की दुकानें नजर आईं। मैं भी सबसे उत्तम भोजनालय की तलाश में दो दो रास्ते का भ्रमण कर आया। रास्ते में मन बनाया की बिरयानी खाएंगे परंतु मैन्यू में बीफ की उपलब्धता देखकर मेरा मन नहीं माना, और उसके ठीक उलट एक जर्जर दुकान दिखाई पड़ी। मैं उसकी तरफ कुछ संदेह और घृणा पूर्ण मुख से बढ़ा। किस मुसीबत में फंस गए!
रात बहुत हो चुकी थी और कई होटल अब बंद भी हो चुके थे एक उसी होटल में 2-3 बंगाली लोग दिखाई दे रहे थे, उनको देख मैंने निश्चय किया कि यहीं खाएंगे। ज्यों-ज्यों मैं अंदर बढ़ रहा था उस स्थान की निरउपयोगिता मुझे स्पष्ट हो रही थी। आधे से ज्यादा सामान, सड़क पर बिखरा पड़ा हुआ था। मैं और अंदर बड़ा तो वहां पड़े बेंचेज़ की हालत पर भी मेरी नजर गई, कहीं काले-काले पूर्ण रूप से स्पष्ट ग्रीस के धब्बे तथा उन्हीं पर फेंके हुए चम्मच करछुल देखकर मैं दंग रह गया। और अंदर बढ़ा तो लगा कि, किसी नई दुनिया में पहुंच गया। चारों ओर से घेरे हुए उस स्थान के काले-काले पुराने प्राचीर वहां की शोभा बढ़ा रहे थे, मानो कारागार की दीवारें हो। उन्हीं के पास ज्यों- त्यों, फेंके हुए बड़े-छोटे बर्तनों से वहां की स्वच्छता का अंदाजा भी हो गया। अंदर ही एक बेंच पर बैठे हुए, बेंच पर चोकर बिखेर कर उस जगह का कर्ता- धर्ता रोटियां बेल रहा था। अपने मिडल क्लास औहदे को ध्यान में रखते हुए मैंने प्रश्न किया 'क्या खाना है?'
रोटियां बेलते हुए वहां के बावर्ची ने मेरी ओर नजर दौड़ाई और टूटी-फूटी हिंदी में पूछा रोटी खाएगा या चावल?। क्योंकि मैंने रोटियों की हालत देखी थी इसलिए कहा-
' नहीं ,चावल खाऊंगा'। 'कैसे है?!'
उसने कहा- '
चावल 20 रुपया प्लेट और रोटी 3 रुपया।
रोटी के दाम और उसकी अवस्था को ध्यान में रखते हुए मैंने व्यंगपूर्वक फिर पूछा- 'रोटी कितना?!'
उसने कुछ खीज कर कहा 3 रुपया ।अब खाना खाने की अपनी मजबूरी को जानते हुए मैं अंदर बढ़ा ,देखा तो एक सज्जन जिन्होंने नीली रंग की टी-शर्ट पहनी हुई थी तड़का जैसा दिखने वाला कुछ खा रहे थे मैंने पूछा यह क्या खा रहे हैं? उस युवक का ध्यान मुझपर पड़ा पर उसने उत्तर देना जरूरी नहीं समझा। मन ही मन मुस्कुराता हुआ मैं अपनी बेंच पर बैठा। मेरे सामने वाला युवक भी चावल ही खा रहे था। परन्तु उन तीनों युवकों के चेहरे और पोशाक देखकर मैं भौचक्का रह गया और अपनी बुद्धि को वहां खाने के निर्णय के लिए कोसने लगा। गूथे हुए आटे को थपकी मारते हुए खानसामा साहब उठे और मैंने भी अपनी दृष्टि उन्ही की तरफ दौड़ा दी। उन्होंने एक पतिलानुमा बर्तन के अंदर अपना पूरा हाथ डाल कर चावल को थाली में उछाल दिया। फिर दाल की बारी आई फिर सब्ज़ी की। मैंने कहा सब्ज़ी क्या है। मालिक ने 'पंचमेलि', 'पांच किस्म की' या 'पांच रुपया' क्या कहा मैं कुछ समझा नहीं। पर अब खाना सामने था। चावल की दशा ठीक ही थी। दाल के नाम पर पानी था परंतु पटल जैसी दिखने वाली कोई चीज भी राजा के मुकुट समान चावल और दाल के मिश्रण के ऊपर सुसज्जित थी। साथ ही उसपर पंच्मेली आलू की सब्जी भरपूर मात्रा में न्यौछावर कर दी गई थी। सोचा अब खाना आ गया है तो खाते- खाते निरीक्षण किया जाए।
दाल जहां भी जान पड़ी उसी दिशा में चावल को घूमा दिया और मुंह में डाला।

मिश्रण को मुंह में डालते ही सदियों से चली आ रहे प्रश्न का व्यंग भी समझ आता रहा। आलू कुछ बेढ़ंगे से कटे हुए थे। कुछ छिले थे, कुछ यूंही फेंक दिए गए थे। मिश्रण में मिर्च की डंठल दिखी तो मन और अप्रसन्न हो गया। और मैंने उससे कहा - 'लंका देना दादा'। उस रसोईए ने जो कि अपने आप को किसी five-star होटल के रसोईया से कम नहीं समझता होगा, झटपट एक बोरिये से 10-15 मिर्च ले आया और सामने पड़ी कटोरी में फेंक दिया। आमतौर पर धोकर खाए जाने वाली मिर्च मुझे यूंही निगलनी पड़ी। कुछ ही समय में मैं होटल का सारा हाल जान गया। परंतु अब भी दाल में विराजमान उस पटल की तरह दिखने वाली वस्तु को मैं न पहचान पाया। वह देखने में तो पटल जैसी ही थी पर बहुत ठोस थी। इसलिए मैंने मालिक की नज़र से बचाते हुए थाली के एक ओर फेंक दिया। तभी मेरे बगल में बैठे व्यक्ति को, उसकी थाली दुबारा धोते देख मैंने सोचा- ' मेरी थाली धुली थी?' यह प्रश्न मुझे अंत तक परेशान करता रहा। पूर्ण रूप से अतृप्त होने के बाद सब्जी के विशिष्ट स्वाद को भुलाने के लिए मैं पुनः मिर्च को खाया, और हाथ धोने का निश्चय किया।

होटल मालिक को 20 रुपए थमाकर मैं बाहर निकला। तभी कुछ देर बाद पिताजी का फोन आया। पूछने पर मैंने कहा - ' खाना अच्छा था' , '20 रूपिया प्लेट '। फोन रखकर हास्टल की ओर बढ़ता हुआ, मैं खुश था कि 50 रूपए बचा लिए। परन्तु न जाने क्यों मां के हाथ के तड़के की याद परेशान करती रही।

Thursday, July 12, 2018

   "सही बात है"

  ये एक वाक्य जो रोजमर्रा की ज़िन्दगी में न जाने हम कितनी बार दोहराते होंगे. इसका उपयोग इंसान की समस्यों से बच के निकल जाने का एक साधन मात्र बन गया था. ये वाक्य समझौते का वाक्य है......

इसके निरन्तर उपयोग को हमने अपनी कमजोरियों से बच निकलने का जुमला बना लिया था. इसका दूसरा उपयोग चाटुकारिता के लिए भी ज्यादा किया गया.
सरकारी बाबुओं से लेकर Corporate offices और यहाँ तक कि गृहस्थ जीवन के झमेलों का एक ही रामबाण उपाय बन गया था "सही बात है", सुनने में मामूली ये वाक्य कइयों के लिए बच निकलने का साधन बन गया. इस तरह हम कह सकते है की सुनने में 'positive' इस वाक्य को हमने धीरे से कब 'negativity' का चोला पहनाया, और शान से सीने से लगाकर घूमने लगे पता ही नही चला.

पर बीते दशक में एक व्यक्ति ऐसा हुआ जिसने 'सही बात है' के इस वाक्य में दोबारा जान फूंक दी. वे थे डॉक्टर हंसराज हाथी. ये 'तारक मेहता का उल्टा चस्मा' धारावाहिक में एक काफी चर्चित कलाकार थे. ये धारावाहिक हम सबने अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी तो जरूर देखा होगा. SONY SAB के इस कार्यक्रम ने आम आदमी के जिंदगी को छोटे परदे पर उतारा और चुनौतियों से लड़ने के अलग मायने दिखाए. इसी कार्यक्रम में देखे जाते थे हमारे 'डॉ. हाथी'. हालाँकि, धारावाहिक के हलके-फुल्के हास्य को बनाए रखने के लिए डॉ. हाथी के मोटापे का काफी इस्तेमाल हुआ.....उनका नाम हाथी रखने से लेकर, उनको 'भुक्खड़' की छवि भी इसी शो ने दिलाई. हममें से कितने हैं जो अपने 'मोटापे' को लज्जा का कारण  
बनाकर बैठे हैं.. उससे बचने के लिए समाज में दिन-प्रतिदिन उलझते है. मोटापे को गलत, और 'फिट' रहने को सही दिखने वाले समाज ने डॉ. हाथी को भी नहीं बक्शा....पर डॉ. हाथी ने अपने इस 'Objectification' के बाद भी कार्यक्रम में अपना किरदार बखूबी निभाया.
कार्यक्रम में उनके होने से दर्शको के होठों पे मुस्कान देखते ही बनती थी. असल जिंदगी में वे कैसे थे उसे तो हम नहीं जान सके लेकिन हाँ, उनका असली नाम 'कवी कुमार आजाद' था 'हाथी' नहीं.
आज़ाद, 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के वो अभिन्न अंग थे जिनके न होने से मन अपने आप कुछ अजीब सा हो जाता था. एक छोटे बच्चे के समान उनकी हँसी दर्शको का दिल जीतने के लिए काफी थी. आज़ाद' एक और सबसे खास बात के लिए प्रसिद्ध थे, वो है उनका तकियाकलाम 'सही बात है'. कभी न कभी कुछ गलत हो जाने वाले 'गोकुलधाम सोसाइटी' के लिए ये 'सही बात है' एक मरहम की तरह थी. 'सही बात है', ये वाक्य इतना प्रचिलित हुआ के बच्चा बच्चा इसका उपयोग करके दूसरों की दबी हुई हँसी को निकलने में माहिर हो गया. बड़ों ने भी इसके इस्तेमाल को कई जगहों पर भुनाया, यहाँ तक की 'HIKE' पर इसके लिए स्टीकर भी बना दिया गया. पर दुःख की बात है, कि सदी के इस हसमुख 'कलाकार' को अब हम और नहीं देख पायेंगे. 9th July,2018 को 'आज़ाद' उर्फ़ हमारे डॉ. हाथी का Heart-attack से निधन हो गया. ये बात उनके चाहने वालों के लिए एक सदमे से कम नहीं है. अब शायद गोकुलधाम सोसाइटी में उलझनों का समाधान इतनी आसानी से कभी नहीं निकलेगा. और शायद शाम को अब्दुल की दुकान पर सोडा पीते हुए सारे यार किसी बात पर 'सही बात है' बिना सुने ही घर को रवाना होंगे.

और ये बिकुल 'गलत बात है'.

अपने तकियाकलाम को सही अर्थ देने वाले 'आज़ाद' अब हमारे बीच नहीं हैं. उनकी कमी न जाने क्यों अभी से ही खल रही है.अब शायद फिर से ये वाक्य अर्थहीन हो जाये. कही फिर से इसमें नकारत्मकता जगह न बना ले इसका डर सबको रहेगा. अंजाम जो भी हो, ये सच है की सदी के इस 'डॉक्टर' ने हम सबका दिल छुआ और भारत के हर घर में अपनी जगह बना ली.
जब भी कभी 'सही बात' पर चर्चा होगी उनकी छवि आँखों के सामने आएगी जरूर.
रंगमंच का ये कलाकार अपने रौब नहीं बल्कि अपनी मुस्कान के लिए हमेशा जाना जायेगा. 

(Picture Courtesy- Picdunia)

छोटे घर की बेटी

हां भाई सही पकड़े हैं  " छोटे घर की बेटी... " भई हम तो न है बडे़  और न बड़ा बन्नो के शौक़ ही हैं, हां माल मोटा मिले और बड़ा घर मिल...